8 मार्च को सम्मान और संदेशों की बाढ़ आती है, लेकिन हकीकत यह है कि महिलाओं की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है।
हर साल 8 मार्च को दुनिया अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाती है। इस दिन सोशल मीडिया पर महिलाओं के सम्मान में पोस्ट लिखे जाते हैं, कार्यक्रम होते हैं और बड़े-बड़े मंचों से नारी शक्ति की बात की जाती है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या महिलाओं का सम्मान सिर्फ एक दिन के लिए है?
भारत की संस्कृति में नारी को हमेशा ऊँचा दर्जा दिया गया है। यहां कहा जाता है “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता।” यानी जहां नारी का सम्मान होता है, वहां देवता वास करते हैं।
लेकिन अगर हम आज के समाज को देखें तो यह आदर्श और हकीकत के बीच की दूरी साफ दिखाई देती है।
आज महिलाएं अंतरिक्ष से लेकर संसद तक अपनी पहचान बना रही हैं। देश की बेटियां सेना में अधिकारी बन रही हैं, खेलों में दुनिया भर में तिरंगा लहरा रही हैं और बिज़नेस व टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में नई मिसालें कायम कर रही हैं।
फिर भी दूसरी तरफ एक सच्चाई यह भी है कि आज भी कई लड़कियों के सपने समाज की बंदिशों में कैद हो जाते हैं।
कई जगहों पर लड़कियों की पढ़ाई को अभी भी उतनी प्राथमिकता नहीं दी जाती जितनी लड़कों को दी जाती है। कार्यस्थलों पर वेतन असमानता और अवसरों की कमी जैसे मुद्दे भी आज की हकीकत हैं।
सबसे बड़ी बात यह है कि आज भी कई महिलाएं अपने ही घरों में निर्णय लेने की आज़ादी से दूर हैं।
महिला दिवस दरअसल सिर्फ जश्न मनाने का दिन नहीं है, बल्कि आत्ममंथन का दिन है। यह दिन हमें यह सोचने के लिए मजबूर करता है कि क्या हम सच में एक ऐसा समाज बना पाए हैं जहां महिलाओं को बराबरी का अधिकार मिला हो।
सच्चाई यह है कि महिला सशक्तिकरण सिर्फ नीतियों या भाषणों से नहीं आएगा। इसके लिए सोच बदलनी होगी घर से, परिवार से और समाज से।
जब एक बेटी को पढ़ने का पूरा मौका मिलेगा, जब एक महिला बिना डर के अपने फैसले ले सकेगी, और जब उसे हर क्षेत्र में बराबरी का सम्मान मिलेगा तभी महिला दिवस का असली अर्थ पूरा होगा।
महिला दिवस का असली संदेश यही है नारी को सम्मान देने की बात मंचों से नहीं, समाज की सोच से शुरू होनी चाहिए।



