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Reading: Supreme Court of India बनाम National Council of Educational Research and Training: पाठ्यपुस्तक विवाद से उठे बड़े सवाल
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Nation Lens > New Delhi > Supreme Court of India बनाम National Council of Educational Research and Training: पाठ्यपुस्तक विवाद से उठे बड़े सवाल
New Delhi

Supreme Court of India बनाम National Council of Educational Research and Training: पाठ्यपुस्तक विवाद से उठे बड़े सवाल

Nation Lens
Last updated: February 27, 2026 9:19 am
Nation Lens
Published: February 26, 2026
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नई दिल्ली। कक्षा 8 की सोशल साइंस की एक किताब को लेकर देश की शिक्षा व्यवस्था और न्यायपालिका आमने-सामने दिखाई दे रही है। “Corruption in Judiciary” शीर्षक वाले अध्याय पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने न केवल कड़ी आपत्ति दर्ज की, बल्कि किताब की सभी प्रतियां  प्रिंट और डिजिटल  तत्काल प्रभाव से वापस लेने का आदेश भी दे दिया।

Contents
    • क्या यह केवल एक अध्याय का विवाद है — या संस्थाओं के बीच टकराव?
    • पूर्ण प्रतिबंध: क्या यह अभूतपूर्व कदम है?
    • माफी: औपचारिकता या वास्तविक स्वीकारोक्ति?
    • चयनात्मक नैरेटिव पर आपत्ति
    • लोकतंत्र, शिक्षा और संस्थागत गरिमा — संतुलन कहां?
  • आगे क्या?

तीन जजों की पीठ, जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश Justice Surya Kant कर रहे हैं, ने कहा कि प्रथम दृष्टया सामग्री न्यायपालिका की संस्थागत गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली प्रतीत होती है और यह “संस्थागत प्राधिकरण को कमजोर करने का प्रयास” हो सकता है।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम से कुछ बड़े और गंभीर सवाल खड़े होते हैं

क्या यह केवल एक अध्याय का विवाद है — या संस्थाओं के बीच टकराव?

किताब “Exploring Society: India and Beyond” में न्यायपालिका की चुनौतियों — जैसे भ्रष्टाचार, लंबित मामलों (बैकलॉग) और जजों की कमी — का जिक्र किया गया था।

सवाल यह है:

क्या संस्थागत कमियों पर चर्चा करना “बदनाम करना” माना जाएगा?

या फिर यह अकादमिक विमर्श (academic discourse) का हिस्सा होना चाहिए?

सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि इस तरह की सामग्री से जनता का विश्वास कमजोर हो सकता है।

दूसरी ओर, शिक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि छात्रों को संस्थागत चुनौतियों की जानकारी देना लोकतांत्रिक शिक्षा का हिस्सा है।

पूर्ण प्रतिबंध: क्या यह अभूतपूर्व कदम है?

कोर्ट ने आदेश दिया कि

सभी हार्ड कॉपी जब्त की जाएं

डिजिटल और ऑनलाइन वर्ज़न हटाए जाएं

स्कूलों और स्टोर्स से तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए

एनसीईआरटी निदेशक और संबंधित स्कूल प्रधानाचार्य शपथपत्र दाखिल करें

साथ ही, निदेशक को अवमानना (Contempt of Court) के तहत कारण बताओ नोटिस भी जारी किया गया है।

इतना व्यापक प्रतिबंध आमतौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा या आपराधिक सामग्री के मामलों में देखा जाता है।

क्या एक पाठ्यपुस्तक अध्याय पर ऐसा आदेश शिक्षा नीति के लिए नई मिसाल बनेगा?

माफी: औपचारिकता या वास्तविक स्वीकारोक्ति?

एनसीईआरटी ने प्रेस नोट जारी कर कहा कि “अनुचित सामग्री” अनजाने में शामिल हो गई थी और किताब वापस ली जाएगी।

लेकिन कोर्ट ने साफ कहा कि वह यह जांच करेगा कि माफी “सच्ची नीयत” से है या “परिणामों से बचने की औपचारिक कोशिश ।

यहां सवाल उठता है

क्या संस्थान अब आत्म-सेंसरशिप की ओर बढ़ेंगे?

क्या भविष्य में विवादास्पद लेकिन जरूरी विषयों से परहेज़ किया जाएगा?

चयनात्मक नैरेटिव पर आपत्ति

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सवाल उठाया कि यदि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर अध्याय है तो फिर कार्यपालिका, राजनीति और नौकरशाही में भ्रष्टाचार पर चर्चा क्यों नहीं?

यह बहस अब एक व्यापक मुद्दे में बदल रही है

क्या पाठ्यक्रम में संतुलन (balance) की कमी थी?

या यह केवल एक संस्थान पर केंद्रित प्रस्तुति थी?

लोकतंत्र, शिक्षा और संस्थागत गरिमा — संतुलन कहां?

भारत जैसे लोकतंत्र में न्यायपालिका को संविधान का संरक्षक माना जाता है।

लेकिन लोकतंत्र का एक स्तंभ आलोचनात्मक शिक्षा भी है।

यदि छात्रों को केवल सकारात्मक पहलू बताए जाएं और चुनौतियां न बताई जाएं, तो क्या शिक्षा अधूरी रह जाएगी?

और यदि चुनौतियां बताई जाएं, तो क्या संस्थागत विश्वास पर आंच आएगी?

यही वह संवेदनशील संतुलन है, जहां यह मामला खड़ा है।

आगे क्या?

मामले की अगली सुनवाई 11 मार्च को होगी।

कोर्ट यह तय करेगा कि माफी पर्याप्त है या आगे दंडात्मक कार्रवाई की जरूरत है।

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