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मेरा नाम मोहम्मद दीपक है..

Nation Lens
Last updated: February 24, 2026 11:52 am
Nation Lens
Published: February 24, 2026
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मेरा नाम मोहम्मद दीपक है।  इन पाँच शब्दों ने उत्तराखंड के एक साधारण जिम संचालक को अचानक राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया। एक हिंदू व्यक्ति द्वारा एक मुस्लिम दुकानदार के पक्ष में खड़े होने की घटना ने उन्हें कई लोगों की नजर में इंसानियत का प्रतीक बना दिया, तो कुछ लोगों की नजर में वे विवाद का विषय भी बन गए।
कोटद्वार की घटना:   26 जनवरी को कोटद्वार में हुई इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गया। वीडियो में 42 वर्षीय जिम संचालक दीपक कुमार कुछ लोगों से बहस करते दिखाई देते हैं, जिन्हें स्थानीय लोग बजरंग दल से जुड़ा बताते हैं।   बताया गया कि कुछ कार्यकर्ता पास की कपड़ों की दुकान “बाबा स्कूल ड्रेस एंड मैचिंग सेंटर” के मालिक, 68 वर्षीय वकील अहमद से दुकान के नाम में इस्तेमाल किए गए “बाबा” शब्द को हटाने की मांग कर रहे थे। उनका तर्क था कि “बाबा” शब्द स्थानीय सिद्धबली बाबा मंदिर से जुड़ा है और इसे किसी मुस्लिम दुकानदार द्वारा इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। हालाँकि भारत में “बाबा” शब्द का प्रयोग संतों, बुजुर्गों या धार्मिक गुरुओं के लिए आमतौर पर सभी समुदायों में होता है।
हस्तक्षेप और वह एक वाक्य:   दीपक का कहना है कि वे पास में ही थे और भीड़ देखकर वहाँ पहुँचे। उन्हें यह ठीक नहीं लगा कि कुछ युवक एक बुजुर्ग व्यक्ति से इस तरह बात कर रहे थे। वीडियो में वे पूछते हैं —
“क्या मुसलमान भारत के नागरिक नहीं हैं?”
जब उनसे उनका नाम पूछा गया, तो उन्होंने जवाब दिया —“मोहम्मद दीपक।”
उनके अनुसार, यह जवाब उन्होंने इसलिए दिया ताकि यह संदेश जाए कि पहचान धर्म से पहले इंसानियत और नागरिकता की होती है।
समर्थन और विरोध:    घटना के बाद दीपक को जहाँ कई लोगों ने “धर्मनिरपेक्ष भारत की मिसाल” बताया, वहीं विरोध का सामना भी करना पड़ा। कुछ दिनों बाद लगभग 150 लोग उनके जिम के बाहर प्रदर्शन के लिए पहुँच गए। पुलिस में दोनों पक्षों की ओर से शिकायतें दर्ज कराई गईं।

इस बीच कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने दीपक को “भारत का हीरो” बताते हुए उनकी सराहना की। 23 फरवरी 2026 को दिल्ली में उनसे मुलाकात कर उन्होंने दीपक के साहस और एकता के संदेश की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा की। यह मुलाकात उनकी कहानी को राष्ट्रीय और राजनीतिक स्तर पर और अधिक चर्चा में ले आई।
सोशल मीडिया और बदली ज़िंदगी:   सोशल मीडिया पर दीपक के समर्थन में बड़ी संख्या में लोग सामने आए। उनके इंस्टाग्राम फॉलोअर्स तेज़ी से बढ़े और एक वीडियो, जिसमें वे कहते हैं — “मैं पहले इंसान हूँ, बाकी पहचान बाद में।”
— उसे लाखों लोगों ने पसंद किया।
लेकिन इस प्रसिद्धि की एक कीमत भी रही। उन्हें सोशल मीडिया पर अपशब्दों और धमकियों का सामना करना पड़ा। एक धमकी भरी कॉल की रिकॉर्डिंग भी सामने आई। इस तनाव का असर उनके परिवार और उनके व्यवसाय पर पड़ा — जहाँ पहले रोज़ करीब 150 लोग ट्रेनिंग के लिए आते थे, अब संख्या घटकर लगभग 15 रह गई।
 एक बड़ा संदेश:    दीपक कहते हैं कि उन्होंने कोई बड़ा अभियान नहीं चलाया — उन्होंने सिर्फ वही किया जो उन्हें सही लगा। उनका मानना है कि अगर समाज में अन्याय के खिलाफ लोग आवाज़ नहीं उठाएँगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ भी चुप रहना सीख जाएँगी। धमकियों और दबाव के बावजूद उनका कहना है कि भविष्य में भी अगर ऐसी स्थिति आएगी, तो वे इंसानियत के पक्ष में खड़े रहेंगे।
यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस बहस की भी है जो आज के भारत में पहचान, अधिकार और सह-अस्तित्व को लेकर जारी है — और शायद यही वजह है कि “मोहम्मद दीपक” नाम आज एक प्रतीक बन गया

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