सुहैल सैफी की कलम से
28 फरवरी 2026 की रात एक ऐतिहासिक घटना के रूप में दर्ज हुई जब अमेरिका और इज़रायल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हवाई और मिसाइल हमले किए। इन हमलों में, ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei सहित उनके परिवार के कई सदस्यों और वरिष्ठ अधिकारियों की मृत्यु की पुष्टि ईरानी सरकारी मीडिया द्वारा की गयी है।
यह हमला बिना किसी औपचारिक युद्ध घोषणा के किया गया, जिससे अंतरराष्ट्रीय कानून और न्याय के उन सिद्धांतों पर गंभीर प्रश्न उठे हैं जो देशों को बिना कारण नहीं लड़ते-झगड़ते हैं।
रात का वो पहर, जब ज़्यादातर शहर सो रहे थे।
लेकिन एक आसमान जाग रहा था… आग के साथ।
मशहद की गलियों से उठकर सत्ता के शिखर तक पहुँचा एक आदमी
जिसे किताबों से प्रेम था, जिसे कविता में सुकून मिलता था…
उसकी आख़िरी रात मिसाइलों की गूंज में लिखी गई।
यह सिर्फ एक सैन्य हमला नहीं था।
यह विचार और शक्ति की टक्कर थी।
एक इंसान की निजी सादगी
और महाशक्तियों के कठोर फैसलों के बीच फँसी हुई कहानी।
उस रात, सिर्फ एक नेता नहीं गिरा…
दुनिया का संतुलन भी काँप उठा।”
अली खामेनेई का जन्म 1939 में ईरान के मशहद नामक शहर में एक साधारण धार्मिक परिवार में हुआ था। उनके पिता खुद धार्मिक शिक्षा देते थे। कम उम्र में ही उन्होंने धर्म, शिक्षा और सामाजिक सेवा में गहरी रुचि दिखाई। ऐसे में लोग उन्हें पढ़ने-लिखने वाला, शांत विचारों वाला और जनता के बीच रहने वाला व्यक्ति मानते थे।
27 जून 1981 को तेहरान की अबूज़र मस्जिद में अली खामेनेई भाषण देने पहुंचे थे।
उसी दौरान एक टेप रिकॉर्डर में छुपाकर रखा गया बम मंच के पास रखा गया। जैसे ही भाषण शुरू हुआ, अचानक जोरदार विस्फोट हुआ। धमाका इतना शक्तिशाली था कि वे गंभीर रूप से घायल हो गए और उनकी दाहिनी हाथ गंभीर रूप से चोटिल हो गया।
इस हमले का आरोप उस समय के सरकार विरोधी उग्रवादी संगठन People’s Mojahedin Organization of Iran (MEK) पर लगाया गया।
हमला इसलिए किया गया क्योंकि 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान में सत्ता और विचारधारा को लेकर तीखा संघर्ष चल रहा था। MEK सरकार और उसके प्रमुख नेताओं का विरोध कर रहा था और उन्हें निशाना बनाकर सरकार को अस्थिर करना चाहता था।
यह हमला उसी राजनीतिक टकराव और अस्थिरता का परिणाम था।
उस कठिन समय के बाद भी वो कभी पीछे नहीं हटे और जनता के बीच खड़े रहे।
उनका जीवन यह दर्शाता है कि उन्होंने कठिनाइयों का सामना धैर्य, विश्वास और दृढ़ता के साथ किया।
सत्ता के शीर्ष पद पर रहने के बावजूद खामेनेई की जीवनशैली को लेकर अक्सर यह कहा जाता रहा कि वे निजी जीवन में सादगी पसंद थे।
उनके करीबियों के अनुसार
वे सादा भोजन करते थे,
साधारण घर में रहते थे,
और निजी जीवन में दिखावे से दूर रहते थे।
उनके समर्थक इसे इस बात का प्रमाण मानते हैं कि वे खुद को जनता से अलग नहीं समझते थे।
खामेनेई को पढ़ने-लिखने का बहुत शौक था।
उन्हें फ़ारसी कविता और साहित्य से खास लगाव था।
वे अक्सर युवाओं को किताबें पढ़ने और शिक्षा को महत्व देने की सलाह देते थे। कई बार उन्होंने कहा कि एक मजबूत देश की नींव केवल सेना या राजनीति नहीं, बल्कि शिक्षा और संस्कृति होती है।
उनकी यह छवि एक ऐसे नेता की बनाती है जो केवल सत्ता नहीं, बल्कि विचार और ज्ञान को भी महत्व देते थे।
28 फरवरी को अमेरिका और इज़रायल ने एक संयुक्त सैन्य अभियान शुरू किया, जिसमें ईरान पर उड़ानों और मिसाइलों से हमला किया गया। इन हमलों का मुख्य बयान यह था कि यह कदम “सुरक्षा के नाम” पर उठाया गया। लेकिन यह हमला बिना किसी युद्ध की घोषणा के किया गया और सीधे देश के राजनीतिक और सैन्य ढांचे को निशाना बनाया गया।
● अमेरिका और इज़रायल द्वारा यह हमला इसलिए गलत माना जा रहा है क्योंकि यह बिना युद्ध घोषणा के किया गया,
एक संप्रभु देश के नेतृत्व को प्रत्यक्ष रूप से मारने वाला कदम था, और इस तरह के हमले अंतरराष्ट्रीय कानून के विरुद्ध हैं।
इस कदम से पूरा मध्य पूर्व ही नहीं, बल्कि विश्व का संतुलन हिल गया है क्योंकि युद्ध की घोषणा किए बगैर किसी देश के नेता को मारना किसी भी सामान्य नियम या नीतिशास्त्र में स्वीकार नहीं किया जाता।
जब ईरान सरकार और जनता को इस हमले की जानकारी मिली, तो पूरा देश सदमे में आ गया। लेकिन जैसे ही स्थिति का आकलन हुआ, ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी। उन्होंने अपने सैनिकों को तैनात किया और कई बार अमेरिका तथा इज़रायल के खिलाफ मिसाइलें दागीं।
ईरानी अधिकारियों ने यह साफ़ कहा कि यह हमला उनके देश की संप्रभुता और सम्मान पर हमला था, और वे इसका उत्तर बहादुरी से देंगे भले ही स्थिति कठिन हो।
पूरे देश में शोक की लहर दौड़ी और सरकार ने 40 दिनों का शोक घोषित किया है। इस दौरान देश में लोग अपने नेता की याद में शोक मनाते हैं और एकता का प्रदर्शन करते हैं।
दुनिया भर के कई देशों ने इस स्थिति पर प्रतिक्रिया दी है
कुछ देशों ने इस हमले को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन कहा है।
कुछ सरकारों ने कहा कि यह कदम शांत प्रयासों को रोक रहा है।
वहीं कई स्थानों पर लोग ईरान के साथ एकजुटता भी दिखा रहे हैं।
यह केवल एक अंक की लड़ाई नहीं है। यह संघर्ष वैश्विक शक्ति संतुलन, राष्ट्रीय सम्मान, कानून और न्याय के उन सिद्धांतों के बीच का संघर्ष है, जिन पर दुनिया अपने देशों के संबंधों को तय करती है।
यह सवाल उठता है:
क्या किसी देश के साथ बिना घोषणा के युद्ध की स्थिति बनाई जा सकती है?
क्या किसी देश के नेता को मारने का कोई औचित्य होता है?
और क्या हम भविष्य में ऐसे और भी संघर्षों की तैयारी कर रहे हैं?
इन प्रश्नों के उत्तर समय ही देगा, लेकिन आज का दिन यह दिखाता है कि संघर्षों
को कूटनीति, बातचीत और समझ से हल करना कितना आवश्यक है।







