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Nation Lens > उत्तराखण्ड > चार धाम यात्रा में भीड़ का दबाव या सिस्टम की कमजोरी? 60 दिन में 72% श्रद्धालु, 86 दिन रहे पूरी तरह खाली
उत्तराखण्डधर्म

चार धाम यात्रा में भीड़ का दबाव या सिस्टम की कमजोरी? 60 दिन में 72% श्रद्धालु, 86 दिन रहे पूरी तरह खाली

Nation Lens
Last updated: March 21, 2026 11:09 am
Nation Lens
Published: March 21, 2026
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देहरादून। उत्तराखंड की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र मानी जाने वाली Char Dham Yatra एक बार फिर सवालों के घेरे में है। इस बार वजह श्रद्धालुओं की संख्या नहीं, बल्कि उनका असमान बंटवारा और उससे पैदा हुआ दबाव है।

SDC Foundation की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि यात्रा 2025 में सिस्टम उस वक्त चरमरा गया जब सबसे ज्यादा जरूरत थी—सीजन की शुरुआत में।

भीड़ वहीं जहां सिस्टम सबसे कमजोर

रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में कुल 51 लाख से ज्यादा श्रद्धालु चार धाम पहुंचे। आंकड़ा भले बड़ा दिखे, लेकिन असली कहानी इसके पीछे छिपी है।

करीब 72% श्रद्धालु सिर्फ पहले 60 दिनों में ही यात्रा पर निकल पड़े।

यानी शुरुआत के दो महीने—मई और जून—पूरे सिस्टम पर सबसे भारी पड़े।

जबकि बाद के महीनों में हालात बिल्कुल उलट रहे—रास्ते खुले थे, धाम खुले थे, लेकिन श्रद्धालु नहीं थे।

एक तरफ भीड़ का सैलाब, दूसरी तरफ सन्नाटा

रिपोर्ट के आंकड़े एक चौंकाने वाली तस्वीर पेश करते हैं—

पूरे सीजन में 86 दिन ऐसे रहे जब एक भी श्रद्धालु नहीं पहुंचा।

सबसे ज्यादा असर Yamunotri और Gangotri में देखने को मिला, जहां दर्जनों दिन पूरी तरह खाली रहे।

यानी एक तरफ शुरुआती दिनों में भीड़ संभालना मुश्किल हो गया, तो दूसरी तरफ लंबे समय तक संसाधन बेकार पड़े रहे।

एक हफ्ता… और 5 लाख से ज्यादा लोग

भीड़ का दबाव कितना ज्यादा था, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जून के पहले हफ्ते में ही करीब 5.5 लाख श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचे।

यह पूरे सीजन का लगभग 11% था—सिर्फ एक हफ्ते में।

ऐसे में सवाल उठता है—क्या मौजूदा व्यवस्था इतनी अचानक आई भीड़ को संभालने के लिए तैयार है?

हेलीकॉप्टर हादसे: क्या जल्दबाज़ी बन रही है खतरा?

रिपोर्ट में दर्ज हेलीकॉप्टर घटनाएं इस चिंता को और गहरा करती हैं।

करीब 6 हफ्तों में 5 घटनाएं, जिनमें 2 हादसों में 13 लोगों की मौत हुई।

Gaurikund के पास हुए एक हादसे में सभी 7 लोगों की जान चली गई।

केदारनाथ रूट पर बढ़ती हवाई आवाजाही और जोखिम अब एक बड़ा सवाल बन चुका है, क्या सुविधा के नाम पर सुरक्षा से समझौता हो रहा है?

मौसम, पहाड़ और मैनेजमेंट—तीनों की चुनौती

हिमालयी इलाकों में यात्रा हमेशा जोखिम भरी रही है, लेकिन रिपोर्ट बताती है कि:
भूस्खलन
खराब मौसम
कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर
इन सबने मिलकर यात्रा को बार-बार रोका।
इसका असर सिर्फ श्रद्धालुओं पर नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों की रोज़ी-रोटी पर भी पड़ा।

रिपोर्ट का साफ संदेश: “संख्या नहीं, संतुलन जरूरी”

Anup Nautiyal के मुताबिक, चार धाम यात्रा को सिर्फ रिकॉर्ड बनाने के नजरिए से देखना अब खतरनाक हो सकता है।
रिपोर्ट साफ तौर पर कहती है कि अगर भीड़ का यह असंतुलन जारी रहा, तो
सुरक्षा
पर्यावरण
और स्थानीय अर्थव्यवस्था
तीनों पर गंभीर असर पड़ेगा।

आखिर समाधान क्या है?

रिपोर्ट में सुझाए गए उपाय सीधे और स्पष्ट हैं—
क्षमता के हिसाब से श्रद्धालुओं की संख्या तय करना
बेहतर आपदा प्रबंधन
हेलीकॉप्टर संचालन में सख्ती
डेटा और टेक्नोलॉजी के जरिए यात्रा का नियंत्रण

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