नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला दिया है। दुबई और अबु धाबी सहित खाड़ी देशों के कई इंटरनेशनल एयरपोर्ट बंद होने से अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी प्रभावित हुई है। भारतीय एयरलाइन्स ने भी कई उड़ानें रद्द कर दी हैं।
सबसे गंभीर असर होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से दिख रहा है। ईरान ने 33 किमी चौड़े इस समुद्री मार्ग को रोक दिया है। यह फारस की खाड़ी के मुहाने पर स्थित है और दुनिया की लगभग 20-25% तेल सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है। प्रतिदिन करीब 2 करोड़ बैरल क्रूड और पेट्रोलियम उत्पाद यहां से ट्रांजिट होते हैं।
ओपेक देशों—सऊदी अरब, इराक, यूएई, कुवैत और ईरान—के लिए एशियाई बाजारों तक तेल पहुंचाने का यह मुख्य मार्ग है। भारत के लिए भी यह बेहद अहम है क्योंकि पिछले वर्ष भारत की 50% कच्चे तेल और गैस की सप्लाई इसी रूट से आई थी। हाल ही में भारत ने रूसी तेल की हिस्सेदारी घटाकर मिडिल ईस्ट से आयात बढ़ाया है, जिससे संकट और गहरा सकता है।
भारत पर संभावित असर
- ऊर्जा संकट: अगर तनाव लंबा खिंचता है तो क्रूड ऑयल की कीमतें 80 से 110 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं।
- महंगाई का दबाव: तेल आयात का बिल बढ़ने से भारत को ज्यादा डॉलर चुकाने होंगे। इससे डॉलर मजबूत होगा और रुपया कमजोर पड़ेगा।
- सोना-चांदी की कीमतें: निवेशक सुरक्षित विकल्प की ओर रुख करेंगे। सोना 1.90 लाख रु. प्रति 10 ग्राम और चांदी 3.5 लाख रु. किलो तक पहुंच सकती है।
- शेयर बाजार पर असर: ऊर्जा संकट और महंगाई की आशंका से निवेशकों का भरोसा डगमगा सकता है।
- आम आदमी की जेब पर बोझ: पेट्रोल-डीजल महंगे होने से परिवहन लागत बढ़ेगी, जिसका असर रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ेगा।
क्या हो सकता है आगे?
- अगर तनाव सीमित रहता है तो बाजार में अस्थायी उतार-चढ़ाव रहेगा।
- लेकिन यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो भारत में महंगाई, मुद्रा दबाव और कीमती धातुओं की कीमतों में बड़ा उछाल संभव है।
मिडिल ईस्ट का तनाव केवल तेल सप्लाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। महंगाई, रुपया और शेयर बाजार पर दबाव के साथ आम आदमी की जेब पर सीधा असर पड़ना तय है। अगर स्थिति जल्द नहीं सुधरी तो भारत को ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए वैकल्पिक रणनीतियां अपनानी पड़ेंगी।



